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बुधवार, 30 जुलाई 2014

गर्व है यदुकुल की बेटी पूनम यादव पर


2014  के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में, पूनम यादव ने पदक जीत कर  अपने परिवार सहित देश और यादव समाज का नाम रोशन किया है। पूनम की इस उपलब्धि का समाचार मिलते ही देश-वासियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई।    यदुकुल की इस बेटी पर  देशवासियों को गर्व है।

 गौरतलब है की  पूनम यादव ने ग्लासगो में चल रहे 20वें राष्ट्रमंडल खेलों में 63 किलोग्राम भारवर्ग की महिला वेट-लिफ्टिंग परियोगिता में  202 किलोग्राम भार उठा कर कांस्य पदक प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। कहा जाता है कि आर्थिक अभावों के चलते आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध न होने बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी और पदक दिलाकर भारत की मेडल-सूची को अलंकृत करने में सफल रही। 

पूनम का जन्म वाराणसी के एक यादव परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम कैलाश यादव है। उनकी  चार बहिनें और दो भाई है। कहा जाता है कि पूनम की  सफलता के पीछे उसके अपने परिश्रम और हौंसले के साथ   उनके परिवार वालों का भी योगदान कम नहीं है। वे अपना तन पेट काट कर इस होनहार बेटी को सफल बनाने में हमेशा हर सम्भव प्रयास करते रहे। 

शानदार सफलता के लिए पूनम यादव और उनके परिवार वालों  को ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाए। आप इसी तरह उपलब्धिया सदैव अर्जित करते रहें और सदा सफलता के शिखर पर विराजमान रहें।


शनिवार, 26 जुलाई 2014

प्रभु देता पल पल सन्देश

परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  कण कण में विद्यमान  हैं। वे सर्वशक्तिमान एवं सर्व व्यापक है सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   आगाह भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग पर चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है।  इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

एक  समय की बात है किसी नदी के किनारे एक छोटा सा गाँव था।  गाँव के बाहर  एक  मंदिर था। मंदिर के प्रांगण में एक  बाबा जी रहते थे । उनका एक मात्र काम था मंदिर में पूजा पाठ करना और  भगवान का गुणगान  करना  । वे अपना  गुजर-बसर चढ़ावे के रूप में मन्दिर से  प्राप्त अन्न-धन  से    करते थे ।

 एक बार  नदी में भयंकर  बाढ़ आ गई।  गाँव के सब लोग अपने  प्राण बचाने के लिए वहां से भागने लगे। लोगो ने बाबा जी को भी वहां से चले  जाने का आग्रह किया।  किन्तु  बाबा जी  नहीं माने । उन्होंने लोगों से कहा-आप सब  अपने  प्राण बचाइए,  मेरी चिंता मत कीजिये , मैं सी  मंदिर  में रहूँगा।   यहाँ भगवान  विद्यमान है,  निश्चित  वह  मेरे प्राण भचायेंगेंतब गाँव के सभी  लोग उदास मन से,  बाबा जी के बिना,  सुरक्षित स्थान पर चले गए।

 नदी का  जल स्तर पल दर पल  बढ़ता  जा रहा था। स्थिति   भयावह  होती  देखकर  गाँव का एक  मल्लाह    नाव लेकर झटपट बाबा जी के पास पहुँचा और विनीत  स्वर में  कहने लगा -' बाबा जी!   यहाँ  रहना खतरे  से  खाली   नहीं है। जल स्तर  तेजी से बढ़ रहा है। आप जल्दी इस  नाव  में  बैठ जाइये  मैं  आपको सुरक्षित स्थान पर पहुँचाये  देता हूँ ।' किन्तु  बाबा जी नहीं माने।  उन्होंने मंदिर को  छोड़कर  अन्यत्र  जाने से साफ़ इंकार कर दिया।

पानी तीव्र गति से मंदिर में घुसने  लगा। बाबा जी के डूब जाने का खतरा मंडराने लगा। तब बचाव दल के कुछ सैनिक बाबा जी को बचाने के लिए  हैलीकाप्टर  लेकर आये।  उसमें से   एक सीढीनुमा   रस्सी नीचे  लटकाई और   बाबा जी को समझाते हुए बोले -"  महात्मा जी !  आप इस रस्सी के सहारे हैलीकाप्टर में आकर  बैठ जाइए अन्यथा  आपके प्राण नहीं बचेंगें।"

 "आप लोग ब्यर्थ परेशान हो रहे हैं , मैं कहीं नहीं जाउंगा, मेरी रक्षा के लिए भगवान स्वयं यहाँ आएंगे।"बाबाजी  ने सैनिको से कहा।

नदी उफान पर थी।   ऊँची ऊँची लहरें उठ  रही थी। भयानक भंवर घुमर रहे थे।   चारों तरफ जल ही जल दिखाई दे रहा था।  बाढ़ ने ऐसा विनाशकारी  रूप धारण किया कि  देखते ही देखते सारा गाँव पानी में डूब गया। बाबाजी भी पानी की  तेज धारा में बहने लगे। मृत्यु को सिर पर मंडराती देख कर बाबाजी डर गए उनको प्राणों  का मोह सताने लगा।  वे बचने का हर संभव  प्रयास  करने  लगे।  जल्दी जल्दी  अपने  हाथ पाँव पटकने लगे। किन्तु तब  तक बहुत देर  चुकी थी।  चिड़िया खेत चुग कर जा चुकी थी।  पानी का बहाव इतना  तेज था कि बचाव स्वरुप  बाबाजी के  सभी प्रयत्न बेकार साबित हुए। लहरों के बीच डूबते उतराते बाबा जी के प्राण पखेरू उड़ गए।

मरने के बाद जब बाबा जी को  स्वर्ग में बैठे भगवान के सामने लाया गया।   तब   उलाहना देते हुए उन्होंने भगवान से पूछा - "हे जग के पालनकर्ता ! हे भगवन!  मैं  जीवन  पर्यन्त आपकी भक्ति करता रहा। सदैव आपकी  सेवा में लगा रहा , किन्तु डूबते समय  आपने मुझे तनिक भी सहारा नहीं दिया।  आप  मुझे बचाने  नहीं आये । क्या यही है आपकी  भक्ति और  सेवा का फल ?"  

 बाबा जी के मुख से यैसी वाणी सुनकर  भगवान ने मुस्करा कर कहा- "महात्मा जी!   मै पल पल आपको सन्देश देता रहा कि वहाँ से भागकर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाओ । आपको बचाने के लिए  मै तीन  बार  आपके पास आया,  किन्तु आपने  मुझे पहचाना ही नहीं। सर्वप्रथम मै   ग्रामीणों के वेश आपके समक्ष उपास्थि हुआ   और आपको  सुरक्षित  स्थान पर चले जाने का आग्रह किया।  आप नहीं माने।  फिर मैं नाविक  के रूप में नाव लेकर आया।  और अंत में सैनिक के वेश में  हैलीकॉप्टर  लेकर  आया ।  अलग अलग वेश में मै आपको बचाने का प्रयत्न करता रहा ।  हर बार आप  मेरी बात मानने से इंकार करते रहे । अब आप ही बताइए इसमें मेरा क्या दोष है? आपने मेरी भक्ति मन से नहीं  तन से की है। आपकी  सेवा दिखावटी थी अन्यथा मानव मुखं से निकली मेरी वाणी को अवश्य पहचान लेते और मेरी बात मानकर सुरक्षित स्थान पर चले जाते ।" 
      
भगवान  के श्रीमुख से ऐसी बात सुनकर बाबा जी  को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे समझ गए कि परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  सर्व व्यापक हैकण कण में विद्यमान  हैं सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   आगाह भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

प्रभु सचमुच  पल पल सन्देश देता  है। समझदार समझ लेता है, नासमझ डूब मरता है। 


                                                     जय श्री कृष्ण!!

बुधवार, 6 मार्च 2013

यदुकुल के महान-योद्धा राव तुलाराम

प्रकृति का नियम है कि  इस संसार में जो आया है  वह  जायेगा। अर्थात मृत्यु अटल सत्य है। किन्तु कुछ व्यक्ति अपनी योग्यता .वीरता, पराक्रम और बलिदान से मृत्यु को परास्त करके सदा के लिए अमर हो जाते है। यदुकुल के  महान- योद्धा राव तुलाराम का नाम ऐसे ही  अमर बलिदानियों की श्रेणी में आता है। पराक्रम और शौर्य  की बदौलत उनका नाम इतिहास के पन्नो में सदा अग्रिम पंक्तियों  और  स्वर्ण अक्षरों में  लिखा जाता रहेगा।

  राव तुलाराम का जन्म 9 दिसंबर 1825 में हरियाणा प्रान्त के रेवाड़ी जिले में एक  यादव राज-घराने ( Royal family) में  हुआ।  उनके पिता का नाम राव पूर्णसिंह तथा माता का नाम ज्ञान कौर था। सन 1939 ईo में उनके पिता का देहांत हो गया। उस समय तुलाराम  की आयु मात्र 14 वर्ष थी। पिता की मृत्यु के बाद उनको रेवाड़ी रियासत की गद्दी सौंप दी गई। किन्तु उनके भविष्य का सारा भार माता  ज्ञान कौर के कन्धों पर आन पड़ा। कर्तव्यपरायण दूरदर्शी माँ ने अपने कर्तव्यों  का पूर्णरूप से  निर्वाह करते हुए  किशोर तुलाराम को भारतीय संस्कृति, उर्दू, फारसी, हिंदी,  धर्म, योग आदि समस्त विषयों की शिक्षा प्रदान करवाई। उनको भारत के वीरों और वीरांगनाओं की  गाथाये सुना सुना कर  बहादुर और निडर  बनाया। राजकुल की परंपरा के अनुसार अस्त्र-शास्त्र, घुड सवारी आदि  की शिक्षा दी गई। तुलाराम की बुद्धि बहुत प्रखर थी जिससे वह राजकाज के कार्यों को ठीक ढंग से निपटाने में सफल हुए। अपने व्यवहार और संस्कार से पारिवारिक शांति स्थापित की। राव तुलाराम  के  तीन रानियाँ रानियाँ थीं। राव तुलाराम के पूर्वजों  के पास 87 गावों  पर आधारित जागीर थी  जिसकी  कीमत 20  लाख रूपये थी।  देश भक्ति का परिचय देते हुए राव राज-वंश ने मराठा-ब्रिटिश संघर्ष के समय मराठों का साथ दिया था।  इससे नाराज होकर फिरंगियों ने उनकी जागीर को  धीरे-धीरे घटाकर  इतना छोटा कर दिया था कि उसकी कीमत मात्र एक लाख रूपये रह गई थी। अतएव  फिरंगी सरकार से रेवाड़ी के राजवंश का नाराज होना स्वाभाविक था।


 ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य 1757 में प्लासी के युद्ध से शुरू हुआ था और  अगले  सौ वर्षों में  कंपनी ने धीरे धीरे छल-बल से लगभग  सम्पूर्ण भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया । इस बीच गोरे फिरंगी  भारत-वासियों पर तरह तरह के जुल्म  ढाते रहे। इस विदेशी जाति ने भारत के मुसलमान बादशाहों एवं हिन्दू राजाओं को अपनी कूटनीति से बुरी तरह कुचल दिया।  देश का धन लूटा जाने लगा।  धीरे धीरे  उत्पीड़न, अत्याचार और  शोषण  इतना बढ़ गया  कि  भारत-वासियों के लिए कंपनी का शासन असह्य हो गया। लोग अंग्रेजों के चंगुल से छुटकारा पाने के लिए बेताब हो गए।  इस बीच  विद्रोह की छुट-पुट कई घटनाये हुई किन्तु कंपनी की फ़ौज  हर बार उसे विफल करने में सफल रही। लेकिन जनता कभी चुप नहीं बैठी। गुलामी की जंजीरों से छुटकारा पाने  के लिए  अन्दर ही अन्दर तैयारी करने में लगी रही। 1857 ई आरंभ होने  तक  भारत में विद्रोह का वातावरण पूरी तरह तैयार हो चुका था। 

 कम्पनी की  सेना में  ब्रिटेन-वासियों के साथ भारतीय नागरिक भी शामिल थे। भारतीयों में अधिकतर हिन्दू और मुसलिम धर्म के  लोग ही थे। 1856 ई में कंपनी ने पुरानी बंदूकों को बदल कर सैनिकों को नई किस्म की  एनफील्ड रायफलें चलाने को दी। इन रायफलों के कारतूसों में चर्बी लगी होती थी, जिन्हें बंदूक में डालने से पहले मुह से काटना पड़ता था। कहा जाता है कि यह चर्बी गाय और सूअर की  होती थी। 1857 के विद्रोह के कई  कारण थे, किन्तु गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूसों ने भारत के हिन्दू और मुसलिम  दोनों समुदाय के सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को पूरी तरह भड़का दिया था। इससे आक्रोशित हो  मंगल पांडे ने  29 मार्च 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी में अंग्रेज अफसरों  को गोलियों से भून दिया।  इस विद्रोह का  दूरगामी परिणाम  निश्चित था। बगावत के जुर्म में फिरंगियों ने  मंगल पांडे को  कैद कर लिया और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फ़ांसी के तख्ते पर लटका दिया। उनके इस बलिदान से निकली आग की लपटों ने ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया  और देखते ही देखते  वह आग  समस्त  भारत में फ़ैल गई।  झाँसी,कानपुर, ग्वालियर,दिल्ली. मेरठ आदि कई जगहों पर उग्र विद्रोह आरंभ हो गये। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे   मुग़ल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफ़र,  80 वर्ष के महान क्रन्तिकारी वीर कुंवर सिंह आदि आजादी के जंगे -मैदान में कूद पड़े। ऐसे में भला  वीर यदुवंशी योद्धा राव तुलाराम कैसे चुप बैठ सकते थे। स्वतंत्रता के इस महासंग्राम  में उन्होंने भी खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।

स्वाधीनता  की वास्तविक  लड़ाई मेरठ से आरंभ  हुई। मेरठ में अंग्रेज शासकों  का  एक बड़ा सैनिक अड्डा था। बंगाल-सेना में फैले असंतोष और मंगल पांडे की  फांसी वाली घटना  से उत्पन्न  आग की लपटें मेरठ तक पहुँच चुकी थी। परिणाम स्वरुप यहाँ के अधिकांश भारतीय सैनिकों ने भी  चर्बी  लगे कारतूसों को चलाने  से मना कर दिया। 9 मई 1857 को इस जुल्म के लिए  85 भारतीय  सिपाहियों  को कठोर कारावास का दण्ड सुनाया गया। उनकी  वर्दी उतरवा ली गई और बेड़ियों में बाँध कर सेना के समक्ष परेड कराई  गई।  तत्पश्चात उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेजों के इस क्रूर कदम से मेरठ शहर और छावनी  में हर जगह अशांति फ़ैल गई। परिणाम स्वरुप मेरठ छावनी के भारतीय  सिपाहियों  ने अंग्रेजी शासन के प्रति खुला  विद्रोह कर दिया।  राव तुलाराम के चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल ने, जो उस समय  मेरठ में कोतवाल के पद पर तैनात  थे,  इस सैनिक विद्रोह का नेतृत्व किया।  विद्रोह इतना जोरदार  था कि इसमें बहुत से ब्रिटिश नागरिक और  सैनिक एवं असैनिक अग्रेज अफसर देखते ही देखते  मौत के घाट उतार  दिये  गए। बगावती सैनिकों  ने जेल के फाटक  तोड़ दिए और बंदी बनाये गए 85 साथी सिपाहियों  के अतिरिक्त  जेल में बंद   800 अन्य कैदियों  को भी छुड़ा लिया।   राव कृष्ण गोपाल ने बड़ी मुस्तैदी से अग्रेजी सैनिकों का सामना किया और  फिरंगी सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। बगावती सेना  जीत का परचम लहराते हुए  दिल्ली की ओर कूच कर गयी। 11 मई को क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली पहुंचे। 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया और मुग़ल सम्राट बहादुर शाह को  दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया। रेवाड़ी में राव तुलाराम भी स्वाधीनता के लिए प्रयत्नशील थे। यह बात राव कृष्णगोपाल  जानते थे। इसलिए मेरठ और दिल्ली में विजय पताका फहराने के बाद अपने बहादुर सिपाहियों को साथ लेकर वे रेवाड़ी आ गए।  रेवाड़ी पहुचने पर उनका  भब्य स्वागत किया गया। राव तुलाराम अपने भाई के कारनामों से बहुत गर्वित हुए थे।
 
विद्रोह के चंद  दिनों बाद राव तुलाराम ने  रेवाड़ी में स्वतंत्रता संग्राम की आग तेज कर  दी। अपने चचेरे भाई  राव कृष्ण गोपाल को उन्होंने सेनापति नियुक्त किया।  वहाँ की जनता मे अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने का साहस पैदा किया।   सेना में नई भरती करके सैन्य शक्ति को सुदृढ़ बनाया। तत्पश्चात 17 मई, 1857 को  पांच सौ यदावों की फ़ौज ने तहसील मुख्यालय  पर धावा बोल दिया।  तहसीदार तथा  थानेदार को बाहर निकल कर  तहसील के खजाने और सरकारी दफ्तरों आदि पर पूर्ण रूप  से कब्ज़ा कर लिया।  राम तुलाराम ने स्वयं को  रेवाड़ी, भोरा और शाहजहानपुर परगनों के 421 गावों का शासक घोषित कर दिया।  रेवाड़ी के निकट रामपुर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया।वे   अपने कुशल प्रशासन के बल पर वह  थोड़े ही समय में  राजस्व, दान और ऋण के रूप में लाखों  रुपये  एकत्रित करने में सफल हो गए। इससे उनकी  आर्थिक  स्थिति बहुत मजबूत हो गयी।  इसके बल पर राव तुलाराम ने  रामपुर में तोप, बन्दूक और  गोला-बारूद बनाने का कारखाना स्थापित किया। राज्य में आन्तरिक   कानून व्यवस्था  बेहतर  बनाये रखने के साथ बाहरी हमलों से बचाव के लिए भी व्यापक प्रबंध किये गए। 

 राव तुलाराम की बढ़ती ताकत की सूचना मिलने पर कंपनी के अंग्रेज- हुक्मरान हैरान  रह गए। अहीर शक्ति को नष्ट करने के लिए 2 अक्टूबर, 1857 को जनरल सोबर्स के नेतृत्व में फिरंगीयों की  एक शक्तिशाली सेना रेवाड़ी पर आक्रमण के लिए भेजी गई । राव साहब द्वारा  निर्मित रामपुर का किला गारे(mud) से बना था। गारे से निर्मित  किले से शक्तिशाली सेना का मुकाबला संभव नहीं था। स्थिति को भाँपकर तुलाराम जी तुरंत रेवाड़ी  से हट गए और अपनी सेना लेकर वे  महेद्रगढ़ की ओर बढ़  गए। वे महेंद्रगढ़ किले से युद्ध करना चाहते थे।  किन्तु मेन्द्र्गढ़ के राजा अंग्रेजों से मिल गया था इसलिय उसने किला  देने से इंकार कर दिया। फिर भी तुलाराम जी  हिम्मत नहीं हारे। दृढ संकल्प लिए उन्होंने युद्ध का मैदान नसीबपुर को बनाया। अंग्रेजी सेना के नसीबपुर पहुचते ही राव साहब ने वहाँ धावा बोल दिया और  भीषण लड़ाई शुरू हो गई।  देशभक्त सेना का आक्रमण इतना जोरदार था ब्रिटिश सैन्य व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। तीन दिन तक चले इस भीषण युद्ध में नसीबपुर की धरती खून से लाल हो गई थी। अंग्रेजी सेना में त्राहि-त्राहि मच गई उनको प्राण बचाना मुश्किल हो गया । इस  युद्ध में शामिल  अधिकांश गोरे सिपाही  मार दिए गए ,जो बचे वे  मैदान छोडकर  भाग खड़े हुए। भागने वालों में ब्रिटिश कमांडर जनरल रिचर्ड भी शामिल था। अंग्रेजों को हार का सामना करना पड़ा।



नसीबपुर की पराजय ने अंग्रेजों को अशांत कर दिया था। हालात की गंभीरता को देखते हुए वायसराय ने कैप्टेन मेंसफील्ड के नेतृत्व में पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ एवं शक्तिशाली सेना  रेवाड़ी की ओर भेज दिया। इस  बार भी भारतीय सेना ने बहादुरी का परिचय देते हुए   ब्रिटिश फौज के   हौसले  पस्त कर दिये। किन्तु दुश्मन की जोरदार  बमबारी से राव साहब की फ़ौज कई हिस्सों में बँट  गई  और  उसके  दो महान योद्धा- राव कृष्ण गोपाल और राव रामलाल वीरगति को प्राप्त हो गये। उसके बाद भारतीय सेना में भगदड़ मच गई। राव साहब की छोटी सी  टुकड़ी  ने सिर पर कफ़न बाँध कर  शक्तिशाली अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया किन्तु परिस्थतियों ने उन्हें पीछे हटने पर विवश कर दिया।  नसीबपुर के इस ऐतिहासिक युद्ध में  भारत माता के वीर बेटों  को भले ही सफलता प्राप्त नहीं हुई,  किन्तु अपने  अपूर्व शौर्य, साहस, वीरता  और बलिदान से  वे अंग्रेजों को भारत की शक्ति का अहसास कराने में पूर्णतया  सफल रहे ।

 नसीबपुर की हार के बाद भी राव तुलाराम चुप नहीं बैठे। उनके अन्दर भारत माता  को आजाद कराने की ज्वाला सदा  धधकती रही। इस बीच  उनको पकड़ने के लिए अंग्रेजो ने जगह जगह फौज के जाल बिछा दिए  और भारी भरकम   इनाम की  घोषित भी कर दी। किन्तु  आजादी के उस दीवाने को वे पकड़ने में  सफल नहीं हुए। राव तुलाराम अंग्रेजों की आँख में धूल झोंक कर झांसी की महारानी लक्ष्मी बाई और तात्या टोपे के पास जा पहुंचे। महारानी लक्ष्मीबाई से विचार विमर्श करके  वे विदेशी सहायता प्राप्त करने हेतु ईरान चले गए।  ईरान की राजधानी तेहरान में उन्होंने रूसी दूतावास के माध्यम से रूस  से सहायता प्राप्ति  का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुए। तत्पश्चात वह  ईरान के शाह से मिले। वहाँ से भी उन्हें कोई सहायता  नहीं मिली  तो वह अफगानिस्तान चले गए। अफगानिस्तान के अमीर दोस्त मोहम्मद खान ने उनका भव्य स्वागत तो  किया किन्तु ब्रिटिश सरकार से अपनी संधि के कारण राव साहब की कोई सहायता नहीं कर सके। इस बीच  उनको  दो बहुत दुखद समाचार प्राप्त हुए  -पहला झांसी की रानी की मृत्यु का  और दूसरा  तात्या  टोपे को फांसी दिए जाने का । इन दो  समाचारों ने राव तुलाराम को बहुत  हताश कर दिया। नतीजतन उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन  ख़राब होने लगा। वह बीमार पड़ गए। राजकीय हकीमों ने उनका अच्छे से अच्चा इलाज किया किन्तु  स्वस्थ नहीं हो सके और अंत में भारतमाता  का यह वीर सपूत 38 वर्ष की आयु में 23 सितम्बर, 1863 को स्वर्ग सिधार गया। काबुल के अमीर ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार करवाया।

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

स्वाधीनता की ढाल: हरियाणा का अहीरवाल

हरियाणा उत्तर भारत का एक समृद्ध और उन्नत प्रान्त है। हरियाणा  शब्द की उत्त्पत्ति कब और  कैसे हुई, इस सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित है।एक मत के अनुसार 'अहिराणा'  के अपभ्रंश से 'हरियाणा' शब्द की उत्त्पत्ति हुई।   एक अन्य मत,  जो लोगों में अधिक मान्य है, के अनुसार हरियाणा शब्द की उत्त्पत्ति 'हरि' के नाम से हुई। भगवान श्रीकृष्ण (हरि) वृज से द्वारिका  जाने के लिए अपने यान में बैठकर इस क्षेत्र से गुजरते थे। इस प्रकार ' हरि +यान' के संयोजन से हरियाणा शब्द की उत्त्पत्ति हुई-ऐसा माना  जाता है। हरियाणा के  अंतर्गत गुडगाँव,रेवाड़ी, महेन्दरगढ़,झज्जर और भिवानी जिले का कुछ भाग तथा वर्तमान में राजस्थान की बहरोड़, मुडावर, बानसूर,कोटकासिम तहसीलों वाला क्षेत्र  अहीर बाहुल्य होने  के  कारण  अहीरवाल कहलाने लगा। स्वाधीनता की ढाल कहा जाने वाला अहीरवाल वीरता की अद्भुत मिसाल  है। यहाँ का व्यक्ति वीर, साहसी, पराक्रमी तथा निडर रहा है।
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 महाभारत  काल  में यहाँ रेवत नामक राजा का राज था। उसकी  पुत्री का नाम रेवती था। वह प्यार से उसे 'रेवा' पुकारता था। उसी के नाम पर राजा ने इस स्थान का नाम रेवा-वाड़ी रखा था। रेवती का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से हुआ, तब राजा  ने  दान स्वरुप इसे बलराम जी को भेट  कर दिया था। बाद में इसका नाम रेवा-वाड़ी से बदल कर रेवाड़ी हो गया।
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मुग़ल काल में यह  वीर भूमि रेवाड़ी रियासत के नाम से विख्यात थी, जहाँ  लम्बे समय तक यदुवंशियों का गौरवमयी शासन रहा। जिसने देश, समाज और जनहित में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। इसी गौरवशाली राजवंश में  महान योद्धा राव तुलाराम का जन्म हुआ। उनकी रहनुमाई में अहीरवाल  के शूरवीरों ने प्रथम स्वाधीनता-संग्राम में जो खून की होली खेली थी, उसका  उल्लेख भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में किया जायेगा। राव तुलाराम की वंशावली  इस प्रकार है:-
    रेवाड़ी राजवंश की वंशावली
चरूराव:
(907 ई. तिजारा राज्य के संस्थापक)
      ।
प्रबल राव
      ।
चतरु राम
      ।
कर्तव्य राव
      ।
सोपान राव
      ।
हरदेव राव
      ।
महासुख राव
       ।
चंद्रभान राव
       ।
हरपाल राव                                                                                               
        ।                                                                         ।
राव मादे सिंह                                                       राव उदय पाल
(राव मादे सिंह ने दिल्ली                        (बोलनी, तीतीरका में आबाद हुए)
 के निकट सुरहेडा आदि
18 गाँव बसाये) 
        ।
राव सुलखन सिंह
         ।
राव किरोड़ी पल
         ।
राव बीठुर सिंह
        |
राव खरवंत सिंह                                                     
        ।                                            ।
राव हरचंद                              राव सुन्दर सिंह
        ।
राव रुडा सिंह(रेवाड़ी के संस्थापक)
      ।
राव राम सिंह

       ।
राव शहबाज सिंह
         ।
राव नन्दराम                                                                                        
        ।                                     ।                                              ।
राव मंशाराम                    राव गूजरमल                             राव बालकिशन
  (निसंतान)                              ।                                          (निसंतान)
_______________________।____________________________________
   ।                   ।                ।            ।                ।               |         
 राव                 राव             राव          राव           राव             राव  
भवानी              तेजसिंह     जीवनसिंह     रामबख्श    किशनसिंह     सवाईसिंह
सिंह                         |      (नांगल )      (धारूहेडा      (लिसान)  (आसयाकी)
   |                          |              |
   |                          |              |
_ |_____________    |             |
 |         |          |      |             |
राव       राव       राव     |             |                                  
दिलेर    राम       हीरा     |            |                                   
सिंह     सिंह       सिंह     |            |
(दत्तक) (दत्तक )  (दत्तक )  |           |
                                 |            |
                                  |           ___________________________
                                  |                   ।                      ।                 ।
                                  |                  राव                  राव             राव 
                                  |                 रामसिंह            किशन      रामलाल
                                  |                                         गोपाल  
                                  |
                                  |
 ______________________________
 ।                       |                    ।
   राव               राव                   राव
 पूर्णसिंह          नाथूराम           जवाहरसिंह
     |                       |            (निसंतान)
     |                       |                    
 राव तुलाराम    राव गोपालदेव
      ।              (राव राजा के
      |                  सेनापति)
      ।    
 राव युधिष्ठिर सिंह
        ।
राव बलबीर सिंह (दत्तक)                                                __________ 
           ।                     ।                    ।              ।                     ।
राव वीरेन्द्र सिंह         सुमित्रा देवी       सुविद्या     सोहन कौर        देवी भागवत
   (दत्तक)                  (बाई जी)  
 

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

विदेह और वैशाली के यादव संघ


 वैशाली का नामकरण महाभारत काल  के इक्षवाकु वंश के  एक राजा के नाम पर हुआ था। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वैशाली ने ही विश्व का सबसे पहला गणतंत्र कायम किया। यह स्थान जैन धर्म के 24वे तीर्थकर भगवान महावीर की जन्म स्थली भी है। इस कारण जैन धर्म के  मतावलम्बियों के लिए वैशाली एक पवित्र स्थान  है। इस पवित्र धरती पर भगवन बुद्ध का  तीन बार आगमन हुआ था। भगवन बुद्ध के समय इसके सोलह महाजनपद थे और मगध के समान  ही यह स्थान भी बहुत महत्वपूर्ण था। आधुनिक समय में यह स्थान बिहार प्रान्त के तिरहुत मंडल का एक जिला है। इसका मुख्यालय हाजीपुर है।

श्रीमदभगवत  पुराण के अनुसार  यदु के  सहस्त्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु नामक   चार थे। यदु के दूसरे पुत्र   क्रोष्टा के  कुल में कई  पीढ़ियों के बाद  भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था।  वही  यदु के ज्येष्ठ  पुत्र सहस्त्रजित के एक पौत्र  का नाम था हैहय । उसके वंशज हैहयवंशी  यादव क्षत्रिय कहलाये।  इसी हैहय वंश में आगे चलकर  तालजंघ नमक एक प्रतापी राजा हुआ। एक बार तालजंघ-वंश के   यादव क्षत्रियों ने इक्ष्वाकुवंशीय राजा सगर के पिता  बाहु को युद्ध में परास्त कर दिया  तब वह भागकर वन में चला  गया  और सगर के पैदा होने से पूर्व ही स्वर्ग गमन कर गया था।

सगर के पिता बाहु को पराजित करके हैहय वंशियों ने वैशाली में  अपने पराक्रम से आठ गणराज्यो वाले एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की,  जिसे 'वज्जि' संघ कहा जाता था। पाणिनि ने  इसको  'वृज्जि'  संघ का  नाम दिया है। इस गण की राजधानी वैशाली थी।  कई इतिहासकार विदेहों और लिच्छवि (लिच्छवियों) के संगठन को वृजिगण मानते हैं,।किन्तु कौटिल्य अर्थशास्त्र  'लिच्छवि' गण को वृज्जि से अलग मानता है। लिच्छवि-वृज्जि गण जहाँ एक ओर  लम्बे समय तक  अपनी  स्वतंत्रता कायम रखने में कामयाब रहे वहीं भारत के इतिहास में एक वीर एवं शक्तिशाली गण  के रूप में अपनी अमिट छाप भी बनाये रखी।

जय श्रीकृष्ण!

रविवार, 23 दिसंबर 2012

स्वागत समारोह

YADAV SAMAJ CHANDIGARH
                             
                                                                           
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पंजाब सरकर द्वारा श्री राम नारायण यादव को विधानसभा अध्यक्ष का सलाहकार नियुक्त किये जाने की ख़ुशी में यादव समाज चंडीगढ़ के सदस्यों ने आज सेक्टर 18  स्थित पंचायत  भवन में एक स्वागत समारोह का  आयोजन किया। सदस्यों ने यादव जी  को हार पहना कर और गुलदस्तों के साथ बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। इस मौके पर सभी वक्ताओं ने यादव जी की उपलब्धियों का गुणगान  किया।

 उल्लेखनीय है कि श्री राम नारायण यादव  परिश्रमी, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार  व्यक्ति हैं। वह समाज सेवा में भी अग्रणी है। हरियाणा विधान सभा सचिवालय से सेवा निवृत होने के बाद उनकी दक्षता,  कार्य कुशलता, कार्य-क्षमता  को ध्यान में रखकर  पंजाब सरकार ने उनको  विधानसभा अध्यक्ष का  सलाहकार  नियुक्त किया है।  इससे  यादव  समाज  के लोगों  को बहुत प्रसन्नता हुई है। यादव समाज  इस कार्य के लिए पंजाब सरकार , विशेषकर डा. चरणजीत सिंह अटवाल अध्यक्ष पंजाब विधान सभा के  आभारी है। 

इस समारोह में अन्य के अतिरिक्त  चंडीगढ़, पंचकुला और मोहाली मोहाली से राम अचल यादव, राम अवतार यादव, केदार नाथ यादव, मुन्नीलाल यादव, छोटे लाल यादव, श्याम लाल यादव ,वरिष्ठ अधिवक्ता  एस के लाम्बा, राव दिलीप सिंह, महिंदर सिंह यादव, वी पी लाम्बा, हरी नारायण यादव, बाबू  राम यादव, दया राम यादव, श्रीप्रकाश यादव, रघुविंदर यादव, राम वृक्ष यादव, चेयरमैन यादव महा संघ राम मूरत यादव, सर्वेश सिंह यादव, भूपेश यादव, फूल चन्द यादव, शिवमूर्ति यादव  शामिल थे।

                                                                                                      (राम अवतार यादव)
                                                                                                          अध्यक्ष 
                                                                                                    स्वागत समारोह

सोमवार, 24 सितंबर 2012

यादवों का कलिंग साम्राज्य



वर्तमान उडीसा राज्य का अधिकांश भाग प्राचीन काल में कलिंग नाम से प्रसिद्द था. उस इतिहास प्रसिद्द कलिंग पर कभी यादवों का साम्राज्य था.  पहली सदी ई.पू.  तक कलिंग का यदुवंशी राजा खारवेल इस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ट सम्राट बन  चुका  था और मौर्य शासकों का 'मगध'   कलिंग साम्राज्य का एक प्रान्त बन  चुका   था. इसका विवरण 'खारवेल का हाथीगुम्फा'  नामक  अभिलेख में मिलता है.    उस  अभिलेख में खारवेल का नाम विभिन्न उपाधियों, जैसे - आर्य महाराज, महामेघवाहन, कलिंगाधिपति श्री खारवेल,  राजा श्री खारवेल, लेमराज, बृद्धराज, धर्मराज तथा महाविजय राज आदि  विशेषणों के साथ उल्लिखित है। 
कलिंग राज्य एवं राजवंश की उत्पत्ति  के बारे में भली-भांति  जानने के लिए यादव
 वंशावली के बारे में जानकारी आवश्यक है. इसलिए   निम्न  अनुच्छेद  में 
संक्षिप्त यादव वंशावली दी गई है:-

"परमपिता नारायण ने सृष्टि उत्पति के उद्देश्य से ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया. ब्रह्मा से अत्रि का प्रादुर्भाव हुआ. , महर्षि  अत्रि के  चंद्रमा नामक पुत्र हुआ.  चन्द्रमा के वंशज चन्द्र -वशी क्षत्रिय अथवा  सोम-वंशी क्षत्रिय कहलाये.    'चंद्रमा के  बुध नामक पुत्र हुआ. बुध का विवाह इला से हुआ इसलिए चन्द्रमा के वंशजों को (इला) 'ऐल' वंश भी कहा जाता है. बुध के  पुरुरवा नामक पुत्र हुआ. पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति उत्पन्न हुए.  ययाति के यदु, तुर्वसु,दुह्यु,  अनु  और पुरु नामक पांच पुत्र  हुए.अनु की वंश परम्परा में आगे चलकर कलिंग नामक राजकुमार हुए. उसके नाम से कलिंग राज्य की स्थापना हुई और  कलिंग का राजवंश चला.ययाति के ज्येष्ठ पुत्र  यदु से यादव वंश चला. यदु के पांच  पुत्र हुए. जिनके नाम क्रमशः .सहस्त्रजित, पयोद, . क्रोष्टा,. नील और  अंजिक हैं, (कई ग्रंथों में यदु के पुत्रों की संख्या चार बलाई गई है) .यदु के  सबसे बड़े पुत्र  सहस्त्रजित के पुत्र का नाम  शतजित था .शतजित के तीन पुत्र हुए- .महाहय , वेणुहय  और हैहय.  हैहय से हैहय-वंशी यादव क्षत्रिय शाखा प्रचलित हुई. इसी वंश परंपरा में  महाराज चेटक हुए. उनके पुत्र का नाम शोभनराय था. शोभनराय अपने श्वसुर के पास रहता था और उनकी मृत्यु के बाद वह कलिंगपति  बना. उस शोभनराय के कुल में आगे चलकर महामेघवाहन खारवेल हुए."

खारवेल का जन्म ई: पू. 235 में  हुआ.  15 वर्ष की आयु में युवराज पद ग्रहण किया तथा  राज्याभिषेक ई.पू. 211 में हुआ.  खारवेल ने अपने राज्याभिषेक  के दो वर्ष बाद कश्यप क्षत्रियों के सहयोग से 'युषिक' राजाओं को परास्त कर उनकी राजधानी को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया. शासनकाल के पांचवें वर्ष में उसने नन्दों को पराजित किया और उनके द्वारा खुदवाई तनसूली नामक नहर को अपने अधिकार में ले लिया. शासनकाल के सातवें वर्ष में खारवेल ने ललक हथिसिंह नामक एक राजा की कन्या से विवाह किया और साथ ही मुसलीपट्टम पर विजय प्राप्त किया, शासन के आठवें वर्ष में मगध पर आक्रमण करके बारबर पहाड़ी पर स्थित गोरठरी किले को नष्ट कर दिया तथा  राजगृह को अपने अधिकार में ले लिया. शासन के 12वें वर्ष में उसने पांड्य राजाओं को परस्त कर उनसे हाथी, घोड़े, हीरे जवाहरात आदि उपहार स्वरुप प्राप्त किया. 

खारवेल जैन धर्म का अनुयायी होने के साथ साथ अन्य धर्मों का भी आदर करता था. उसने कुमारी पर्वत पर अहर्तों के लिए देवालय निर्मित करवाया. उदयगिरि में 19 तथा खंडगिरि   में 16 विहारों का निर्माण कटवाया. अपने शासनकाल  में उसने एक बार ब्राहमणों को सोने का कल्पवृक्ष भेंट किया था. उस वृक्ष के पत्ते भी सोने के बने थे. 

खारवेल का निधन ई. पू. 198 में हुआ. साहसी, न्याय-प्रिय, दान-प्रिय एवं धर्मशील होने कारण उसने  सुख, शांति, समृधि का सम्राट, भिक्षु सम्राट, धर्मराज आदि रूप में ख्याति प्राप्त किया. 



रविवार, 27 मई 2012

नंदमहर धाम

 

 उत्तर प्रदेश के  अमेठी जिले के मुख्यालय गौरीगंज से मुसाफिरखाना मार्ग पर 16 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह स्थान पौराणिक महत्त्व समेटे हुए है।  यह  यादवों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल  है। इस स्थान का प्रादुर्भाव कब हुआ इस विषय में कई मत प्रचलित हैं। एक किंवदंती के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम के साथ पौंड्रक नामक घमंडी राजा  को मारने के लिए द्वारिका से काशी गए हुए थे। तब वसुदेव और नंदबाबा उनको खोजते हुए यहाँ  आये थे। उस समय यहाँ घना जंगल था। पौंड्रक  को मारकर श्रीकृष्ण बलराम के साथ  द्वारिका वापस  जा रहे थे,  उस  समय नन्दबाबा  और वसुदेव से उनकी मुलाकात  इसी स्थान पर हुई। सभी लोगों ने यहाँ तीन दिन तक विश्राम किया।  उसी दौरान यहां एक यज्ञ का आयोजन भी  किया गया।  नंदबाबा ने भगवान की मूर्ति स्थापित करके उनकी पूजा की थी। श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव और नंदबाबा के चरणरज से यह स्थान  पवित्र हो गया। यदुवंशियों के पूर्वज होने के कारण  यह स्थान उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया। तभी से लोग यहाँ अनवरत यज्ञ, हवन और  पूजा करते आ रहे हैं। प्रभु की याद में धाम के पड़ोस में बसे तीन गांवों का नाम इस प्रकार है-हरि (श्रीकृष्ण) के नाम पर हरिकनपुर, वसुदेव के नाम पर बसयातपुर और नन्द के नाम पर नदियाँवा।

नन्दबाबा ने जिस स्थान पर पूजा की थी, वहां पहले  मिट्टी का चौरा (चबूतरा) था। किन्तु बाद में, सन 1956 ई. में ,  उस चौरे के स्थान पर मंदिर का निर्माण करावाया  गया। उस मंदिर  के भीतर  मूर्तिकक्ष में प्रत्येक मंगलवार को  गाय और भैंस  का  दूध चढ़ाये जाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि  गाय भैंस के बियाने के बाद आगामी  पांच मंगलवार  यहाँ दूध  चढाने  से वह गाय भैंस स्वस्थ रहने के साथ  बहुत  दिनों  तक अधिक  दूध देती है। जाति-पाति का भेदभाव किये बिना  सभी धर्मों और समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मंगलवार को यहाँ  दूध चढाने आते है।
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यह स्थान 'राजाबली' और 'पंवरियां' की पूजा के लिए  बहुत प्रसिद्द है. उल्लेखनीय है कि इस  क्षेत्र के अधिकांश यदुवंशी  'राजाबली' और 'पंवरियां' नामक देवता की पूजा करते हैं। उन पुजारियों को ओझा कहा जाता है। पारम्परिक समाज में मान्यता  है कि ओझा में प्रत्यक्ष दुनिया से बाहर किसी रूहानी दुनिया, आत्माओं, देवी-देवताओं या ऐसे अन्य ग़ैर-सांसारिक तत्वों से सम्पर्क रखने या उनकी शक्तियों से लाभ उठाने की क्षमता होती है। ओझाओं के बारे में यह धारणा भी है कि वे अच्छी और बुरी आत्माओं तक पहुँचकर उनपर प्रभाव डाल सकते हैं और  ऐसा करते हुए अक्सर वे किसी विशेष चेतना की अवस्था में होते हैं। ऐसी अवस्था को  किसी देवी-देवता या आत्मा का 'चढ़ना' या 'हावी हो जाना' कहतें हैं। यह प्रथा कमोबेश आधुनिक समाज में भी मान्य है, किन्तु अधिकांश लोग इसे अन्ध-विश्वास मानते हैं। नंदमहर धाम में आने वाले ओझा लोग  राजबली और पवंरिया के पुजारी होते हैं और विशेष चेतना अवस्था में इनके ऊपर इन्ही देवताओं की सवारी होती है।कई पुजारी  प्रत्येक मंगलवार को नियमित रूप से नन्दमहर धाम आते है और अपने ईष्टदेव अर्थात राजबली महाराज और पवंरिया  के नाम की हवन करते हैं।  पचरा जो कि रिझाने वाला गीत है उसको गाकर महाराज को प्रसन्न करते है और उनकी अलौकिक शक्तियों के द्वारा  कथित उपरी हवा, भूत,-प्रेतों  आदि बुरी आत्माओं से  पीड़ित लोगों का इलाज करते हैं।
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राजाबली और पवंरिया कौन हैं? इसके बारे में मंदिर के महंत भारतनन्द का कहना है कि रोहिणी नंदन  बलराम को राजाबली  और उनके अंगरक्षक को पंवरिया कहा जाता है.नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया द्वारा प्रकाशित  हिन्दी समातर  कोश में  भी 'बली' का अर्थ 'बलराम (दाऊ)' और   पवंरिया का  अर्थ 'पहरेदार'  बताया गया  है। इससे स्पस्ट होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण के भ्राता श्री बलरामजी को राजबली  और उनके सेवक को पवंरिया  कहा जाता है। शक्ति और पराक्रम के  प्रेरणा-श्रोत होने के कारण  लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास से उनकी पूजा करते हैं।
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प्रति वर्ष कार्तिक मास की  पूर्णिमासी  को यहाँ   बहुत बड़ा  मेला लगता हैं. इसे  नन्दमहर बाबा का मेला कहा जाता है. इसे यादवों का महाकुम्भ भी कहा जाता है। उस दिन वहां  श्रद्धालुयों का जनसैलाब देखते ही बनता है। सुल्तानपुर, फैजाबाद,बाराबंकी, आजमगढ़,  बहराइच, गोंडा, आंबेडकर नगर, प्रतापगढ़, रायबरेली आदि  अनेक जिलों के श्रद्धालु  बड़ी  संख्या में  यहां हरि  दर्शन हेतु आते है। एक अनुमान के  अनुसार दो दिन तक चलने वाले इस यादव-महाकुम्भ  में लगभग एक लाख श्रद्धालु शिरकत करते है।  व्रत धारण किये हुए ओझा लोग यहाँ  हर्ष-उल्लाष के साथ, ढोल नगाड़ों की थाप पर, राजाबली  और पंवरिया की   पूजा  करते है। दीपावली की भाँति मिट्टी के  बने दीयों में जगमगाते  दीप के द्वारा  हवनकुण्ड को सजाया जाता है। तदोपरांत  विधि-पूर्वक  हवन की जाती  है।  सभी पुजारियों का  हवन-कुण्ड अलग-अलग होता है। सामूहिक रूप से हवन करने  की प्रथा नहीं है। मंदिर के  प्रांगण में भक्तों द्वारा राजाबली महाराजऔर पवंरिया के नाम का  'निशान'  चढ़ाये जाने की परंपरा भी  है। यह दृश्य उस दिन का  मुख्य आकर्षण होता  है।  रंग-विरंगे कपड़ों से बने  अनेक  झंडियों वाले  ध्वज या  पताके  को 'निशान' कहा जाता है। निशान चढाने के लिए भक्तगण  मीलों पैदल चल कर, हथेली पर प्रज्वलित दीप थामे, राजबली महाराज के नाम का मन्त्र गुन -गुनाते नंदमहर धाम तक पहुंचते है।  कन्धों  पर  ध्वज उठाये हुए अन्य व्यक्ति उनके पीछे-पीछे चलकर आते हैं।  काबिलेगौर है कि इस दौरान रास्ते  में ना तो ज्योति  बुझने दी जाती  है और नहि ध्वज को पृथ्वी पर रखने दिया  जाता हैं।   ऐसे सैकड़ों  ध्वज  प्रति-वर्ष  यहाँ चढ़ाये जाते हैं। रंग-विरंगे लहराते झंडों से सजा  नन्दमहर धाम उस दिन बहुत  शोभायमान होता  है।
                                                                                                      

                           

        
                      जयश्रीकृष्ण 


गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री -अखिलेश यादव


यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री -अखिलेश यादव 
      
          यादव इतिहास बड़ा गौरवशाली है. इस कुल में समय-समय पर, जीवन के हर क्षेत्र में,  ऐसी अनेक विभूतियों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने सामर्थ्य,  योग्यता एवं कुशलता  के बल से न केवल विश्व के इतिहास पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, बल्कि यदुकुल का भी नाम रोशन किया. राजनैतिक  क्षेत्र में भी ऐसे ही  अनेक  यदुवंशियों  ने समाज व देश  की सेवा करते  हुए उच्च पदों पर आसीन हुए. विभिन्न गौरवशाली पदों पर काम कर चुके  ऐसे अनेकों  महानुभाव  हैं  उन सबका  नाम लिखना यहाँ असंगत होगा.

 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  विभिन्न प्रदेशों में अब तक तीन  यदुवंशियों  को  राज्यपाल , दस को  मुख्यमंत्री  और एक को  लोकसभा स्पीकर  के रूप में पदासीन  होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है.  उनका विवरण नीचे दिया गया है:-

 मुख्यमंत्री-दिल्ली में :
1 . चौधरी ब्रह्मप्रकाश, दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री (1952 से 1955 तक) 

मुख्यमंत्री-उत्तर प्रदेश में :
1 .राम नरेश यादव -----------(23 .6 .1977   से 27 .2 . 1979   तक ) 
2 .  मुलायम सिंह यादव -----(2 .12 .1989 से 24 .6 .1991 तक )
      मुलायम सिंह यादव----(4 .12 .1993 से 2 .6 .1995 तक   ) 
      मुलायम सिंह यादव-----(29 .8 .2003 से 12 .5 .2007 तक )
3    अखिलेश यादव...........(15.3.2012 

मुख्यमंत्री-बिहार में :
1 . वी.पी. मंडल ----------------1968
2 . दरोगाप्रसाद राय ----------(16 .2 .1970 से 22 .12 .1970 तक )
3 . लालू प्रसाद यादव--------(11 .3 .1990 से 24 .7 .1997 तक )
4. राबडी देवी -----------------(24 .7 . 1997 से 3 .3 .2000 तक ) 
    राबडी देवी----------------(11 .3 .2000  से 7 .3 .2005 तक  )

मुख्यमंत्री-मध्य प्रदेश में :
1 . बाबूलाल गौर --------2007

मुख्यमंत्री-हरियाणा में :
1 . राव वीरेन्द्र  सिंह 1967  


राज्यपाल -राजस्थान में
1.बलिराम भगत
 
राज्यपाल-गुजरात में
1.महीपाल शास्त्री 
 
राज्यपाल-मध्य प्रदेश में
1. राम नरेश यादव  

 लोकसभा स्पीकर:
1. बलिराम भगत 

 वर्तमान समय में मुलायम  सिंह यादव और उनके सुपुत्र अखिलेश यादव  ऐसे दो  महान व्यक्ति  हैं जिनका जिक्र आते ही यदुवंशियों का सीना  गर्व से फूल जता है. मुलायम सिंह यादव एक जाने माने सफल समाजवादी नेता है. उन्हें लोग प्यार से "नेताजी'"  कहते हैं. वे तीन बार उत्तर-प्रदेश के  मुख्यमंत्री तथा एक बार केंद्र में रक्षामंत्री रह चुके हैं. अपने पिताश्री के  पद-चिन्हों पर चलते हुए  अखिलेश यादव ने हाल ही  में हुए  उत्तर प्रदेश की विधान-सभा चुनाव में, युवा वर्ग के सहयोग से , अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया. विधान -सभा की 403  में 224 सीटें जीत कर उन्होंने सबको आश्चर्यचकित कर दिया.  15 मार्च, 2012  वे यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री बने. वे उत्तर प्रदेश के सबसे कम आयु वाले मुख्यमंत्री है. 

अखिलेश यादव बेदाग छबि, मृदुभाषी तथा प्रगतिशील विचारों वाले युवा नेता है. उनका जन्म 1 जुलाई, 1973 को उत्तर प्रदेश में  इटावा जिले के सैफई गाँव  में हुआ.  इनके पिता  का नाम मुलायम सिंह यादव  और माता का नाम मालती देवी है. इनका विवाह  1999  में डिम्पल यादव से हुआ. इनके  अदिति,   टीना और अर्जुन नाम वाले  तीन बच्चे  हैं.  इनके पिता एक जाने-माने  समाजवादी नेता हैं. भारतीय राजनीति  में उनका विशिष्ट स्थान है.   अखिलेश यादव की  प्रारंभिक शिक्षा  इटावा में तथा उच्च स्कूली शिक्षा मिलिटरी स्कूल धौलपुर राजस्थान से हुई.   इंजीनियरी में  स्नातक स्तर की पढाई मैसूर यूनिवर्सिटी  से  और आर्ट्स में  मास्टर डिग्री सिडनी यूनिवर्सिटी से उत्तीर्ण  किया.

अखिलेश यादव ने  वर्ष 2000 में   कन्नौज संसदीय क्षेत्र से मध्यावधि चुनाव जीत कर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया. तब से अब तक वे तीन बार लोक सभा के सदस्य चुने जा चुके हैं. वर्ष 2009 में अखिलेश जी ने कन्नौज और फिरोजाबाद दो संसदीय क्षेत्रो से जीत हासिल किया  परन्तु बाद मेंफिरोजाबाद  सीट से त्यागपत्र दे दिया और  कन्नौज लोकसभा सीट को कायम रखा.

अखिलेश जी  उत्साहित ,तेजस्वी और सही सोच-वाले युवा नेता हैं. उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन को दूर करके  विकास के उच्च शिखर पर ले जाने की उनकी  तीव्र  इच्छा भी  हैं. धार्मिक एवं जातिगत भावनाओं  से दूर रहकर वे सभी युवक-युवातियों को उन्नति के शिखर पर ले जाना चाहते है. उन्हें भली-भाँति मालुम है  कि  यह शुभ कार्य समाज के हर वर्ग को समान दृष्टि से देखते हुए तथा  न्याय के मार्ग पर  चलकर ही संभव है. मुख्यमंत्री   प्रदेश के  सभी नागरिकों का नेता होता है न कि किसी वर्ग विशेष का.  अतः उनके इस महान कार्य  को  सफल  बनने के लिए समाज के हर वर्ग से सहयोग की आवश्यकता है.

    

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

Akrur अक्रूर


यदुकुल की अनेक शाखाए और उप-शाखाये हैं. उनमें  'वृष्णि-वंश' नाम की एक सुप्रसिद्ध और परम पवित्र शाखा भी है जिसे भगवान श्रीकृष्ण का पितृ-कुल माना जाता है. अक्रूर जी का जन्म इसी वंश में हुआ था. वे रिश्ते में श्रीकृष्ण के चाचा लगते थे. 

अक्रूर के  पिता का नाम श्वफल्लक तथा माता का नाम गांदिनी था।  श्वफल्लक जहाँ भी रहते थे वहां ब्याधि, अनावृष्टि आदि का भय नहीं रहता था।  एक बार  काशी के शक्तिशाली राजा  के राज्य में तीन वर्ष तक पानी नहीं बरसा तब उन्होंने श्वफल्लक को बुलाकर अपने यहाँ ठहराया। उनके वहां पधारते ही जल बरसना शुरू हो गया। तदन्तर उसी काशिराज की गांदिनी नामक  पुत्री से उनका विवाह हो गया।  उस दम्पति से तेरह पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई. उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर जी थे. अक्रूर के अतिरिक्त श्वफल्लक के अन्य पुत्रों का नाम - आसंग, सारमेय, मृदुर, म्रिदुविद, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गंधमादन और प्रतिवाहु था तथा पुत्री का नाम सुचीरा था. 

 अक्रूर के देवयान और उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।  अक्रूरजी के बारे में कहा जाता है कि वे दान देने वाले, यज्ञ करने वाले, शास्त्रों के ज्ञाता, अतिथियों से प्रेम करने वाले, धैर्यवान, ज्ञानी और धर्मात्मा थे। अपने पिता की भांति वे भी जहाँ जाते थे वहाँ का वातावरण मंगलमय हो जाता था।  चारों तरफ खुशियाँ बिखर जाती थीं .

कंस मथुरा का राजा  था।  वह अत्यंत क्रूर, दुराचारी  और राक्षस प्रवृति का शासक था।   वह श्रीकृष्ण का मामा लगता था.  श्रीकृष्ण की माता देवकी उसकी चचेरी बहन थी. देवकी  उसको बहुत ही  प्रिय थी।  उसने अपनी प्रिय बहन का विवाह बहुत धूम धाम से वसुदेव  जी  के साथ किया . किंतु विवाहोपरांत  जब वह देवकी और वसुदेव को रथ मे बैठाकर उनके घर छोडने जा रहा था तो मार्ग मे आकाशवाणी हुई - "हे कंस !  तू जिसे इतने धूम-धाम से  उसके घर छोडने जा रहा  है उसी  के आठवें पुत्र के हाथों तेरी मृत्यु निश्चित है" - आकाश मार्ग से आयी देववाणी के ये शब्द सुनकर कंस अत्यंत भयभीत हो गया . वह तत्क्षण ही देवकी का वध कर देने के तैयार हो गया।   वसुदेव जी के बहुत समझाने-बुझाने और अनुनय -विनय करने  पर भी वह नही माना।  देवकी के बाल पकड कर रथ से नीचे खींच लिया।   म्यान से तलवार   खींच कर  यमदूत की  भान्ति उसके सामने खडा हो गया।  देवकी की मृत्युं को निश्चित मान उसके पर्णों की रक्षा हेतु अन्तिम प्रयास करते हुए वसुदेव ने कंस को आश्वासन देते हुये कहा - "हे महाराज कंस ! देवकी से तो आपको कोई  भय है ही नहीं . आकाशवाणी के अनुसार  आपकी मृत्यु उसके आठवें पुत्र से होगी। लेकिन मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि इसके गर्भ से उत्पन्न सभी संताने उनके पैदा होते ही आपको सौंप दिया करूंगा।" वसुदेव के इस प्रकार वचन देने पर उसने देवकी को छोड दिया। किंतु उसके आशंकित मन ने उसका पीछा नही छोडा।  उसके भयभीत मन ने देवकी और वसुदेव को कारागार मे डालने के लिए विवश कर दिया। 

 देवकी के जो भी पुत्र पैदा होता  अपने वचन के अनुसार वसुदेव उसे क्रूर कन्स को सौंप देते।  वह बड़ी निर्दयता से उसे मार दिया करता था।  इस प्रकार कन्स ने देवकी के छः पुत्रों को मार डाला।  सातवी बार देवकी के गर्भ मे  भगवान के अन्शावतार शेष जी का आगमन हुआ  । जिन्हे भगवान की आज्ञा के अनुसार योगमाया ने  वसुदेव की रोहिणी नामक  एक अन्य स्त्री  के गर्भ मे स्थापित कर दिया जो उस समय गोकुल मे नन्द के घर मे आश्रय  लिए हुए थी।    इस प्रकार देवकी का सातवाँ पुत्र रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस  बालक का नाम बलराम था। आठवीं बार परमपिता भगवान श्रीहरि स्वयं देवकी गर्भ मे विराजमान हुए और रोहिणी नक्षत्र  भाद्र पद कृष्ण-पक्ष की अष्टमी अर्धरात्रि में कंस के बंदीगृह में  चन्द्रमा के समान, सोलह कलाओं  से पूर्ण वे  भूलोक में अवतरित हुए।  उसी समय गोकुल मे नन्द के घर योगमाया ने यशोदा के गर्भ से कन्या के रुप मे अवतार लिया। भगवान की आज्ञा के अनुसार वसुदेव जी अर्ध रात्रि मे ही बालक को गोकुल लेजाकर अनभिज्ञ  सोई पड़ी यशोदा की गोद में लिटा दिया और कन्या के रूप में उत्पन्न योगमाया को अपने घर लाकर यशोदा को दे दिया। बंदीगृह से नवजात शिशु के रोने की आवाज़ सुनकर जब  पहरेदारों ने कंस को सूचित किया तो वह शीघ्र ही वहाँ आ पंहुचा और झटपट देवकी की गोद से  कन्या को छीन लिया और बाहर लाकर एक शिला पर पटक दिया।

मुझे मारने वाला अब भी जीवित है- यह सोचकर कन्स  हमेशा  भयभीत रह्ता था।   एक दिन  देवर्षि नारद ने कंस  के महल मे पाधारे और उसको बताया कि देवकी गर्भ से उत्त्पन्न उसका आठवां पुत्र अभी जीवित है. उसका नाम कृष्ण है. उसके  पैदा होते ही वसुदेव ने उसे  नन्द के यहाँ पहुंचा दिया था और वहां से यशोदा की नवजात कन्या को ले आया था. उस कन्या को देवकी की आठवीं संतान बताकर वध करने के लिए तुम्हे दे दिया था. वह वध करते समय तुम्हारे हाथ से छूटकर यह कहती हुई आकाश में उड़ गई थी कि -"हे पापी कंस! तू मुझे क्यों मारता है तेरा काल तो संसार में अन्यत्र जन्म ले चुका है". यह सब जानकर उसकी आशंका विश्वास में बदल गई और उसके क्रोध का ठिकाना न रहा. .उसने तत्काल वसुदेव को राजसभा में बुलावाया. वह क्रोधवश वसुदेव की हत्या कर देना चाहता था किन्तु देवर्षि नारद के कहने पर ऐसा नहीं किया. लेकिन राजसभा में यदुवंशियों के समक्ष उनको बहुत अपमानित किया.

कंस ने कृष्ण का वध करने की एक नई योजना बनाई. योजना के अनुसार धनुष-यज्ञ नामक एक उत्सव आयोजित करने का निश्चय किया. वह कृष्ण और बलराम को उत्सव देखने के बहाने मथुरा बुलाकर मतवाले हाथी के द्वारा मरवा देना चाहता था. हाथी से बच निकालने पर अखाड़े में चाणूर, मुष्टिक,कूट, शल, तोशाम आदि जैसे खतरनाक पहलवानों के साथ मल्ल करवा कर वध कर देने का निश्चय किया. तब प्रश्न यह था क़ि उनको लिवा लाने के लिए ब्रज किसको भेजा जाए? अक्रूर जी कंस के यहाँ दान-विभाग के अध्यक्ष थे. वे बहुत ही मिलनसार, प्रभावशाली और कुशल कूटनीतिज्ञ थे तथा अन्धक, वृष्णि , भोज आदि सभी यदुवंशियों में सम्मानीय भी थे . उनके माध्यम से भेजे गए आमंत्रण को कृष्ण, बलराम और नन्द षडयंत्र नहीं समझेंगे और आमंत्रण स्वीकार कर भेंट सामग्री साथ लेकर सहर्ष मथुरा आ जाएंगें. ऐसा विचार कर उसने अक्रूरजी को यह कार्य सौपा. अक्रूर जी भगवान के बड़े भक्त थे. उन्होंने सोचा क़ि यह तो मेरा सौभाग्य है. इसी बहाने पर-ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हो जायेंगे. वे रथ में बैठकर भगवान के दर्शन क़ी बात सोचते हुए ब्रज में जा पहुंचे. उनको वहां आया देख नन्द, यशोदा ,गोप आदि सब आनंदित हो गए और उनका यथोचित आदर सत्कार किया . कृष्ण और बलराम ने उनको ह्रदय से लगा लिया.

अक्रूरजी ने ब्रज में आकर कंस के सन्देश को कह सुनाया और एकांत में श्रीकृष्णचंद से कहा - "कंस यादवों से शत्रुता का भाव रखता है. उसने वसुदेव और देवकी को हथकड़ी से जकडकर कारागार में बंद किया हुआ है. आप दोनों भाइयों को उत्सव में शामिल होने के बहाने मथुरा बुलाकर वध कर देना चाहता है". भगवान श्रीकृष्ण यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने दुष्टों को मारकर पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए ही मानव रूप में अवतार लिया था. कंस जैसे पापी और दुराचारी को मारने का इससे अच्छा अवसर फिर नहीं मिलेगा, यह सोचकर भगवान श्रीकृष्णचंद और रोहिणीनंदन बलभद्र अक्रूर के साथ उत्सव में शामिल होने के लिए मथुरा जाने के लिए तैयार हो गए. .नन्दबाबा सहित अनेक गोपगण भी उनके साथ चल पड़े. श्री अक्रूर जी बहुत ज्ञानी और दिव्य शक्ति के रखवाले थे. लेकिन भगवान को मथुरा ले जाते समय उनके मन में शंका उठने लगी क़ि क्या श्रीकृष्ण कंस वध कर पाएंगे ? एसा न हो कि कंस अपनी योजना के अनुसार राम-कृष्ण का वध करने में सफल हो जाय. इसी शंका के वशीभूत होकर उनके मन के विचार चेहरे पर चिंता के रूप में दिखाई देने लगे. अन्तर्यामी भगवान उनके ह्रदय के भाव को समझ गए. अक्रूरजी स्नान करना चाहते थे. अतएव उन्होंने कुछ दूर जाने के बाद यमुना के किनारे रथ को रोक दिया और यमुना में स्नान करने के लिए चले गये. श्रीकृष्ण और श्री बलराम- वहां रथ में ही बैठे रहे. उन्होंने स्नान करते समय जब डुबकी लगाई तो भगवान कृष्ण मुस्कराते हुए जल में बैठे दिखाई दिए. अक्रूरजी सोचने लगे क़ि देवकीनंदन यमुना किनारे रथ में बैठे थे, वे जल के भीतर कैसे आ गये? शायद वे अब रथ में नहीं होंगे. ऐसा सोचकर मस्तक जल से बाहर निकाला तो देखा कि लीलामयी भगवान श्रीकृष्ण भ्राताश्री बलराम के साथ यमुना किनारे यथावत रथ पर बैठे हुए हैं. उन्हें आश्चर्य हुआ कि एक ही समय में वे जल के अन्दर और बाहर दोनों जगह कैसे विद्यमान हो सकते हैं? मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा हूँ. यह सोचकर पुनः जल में डुबकी लगाई तो प्रभुजी को फिर जल में बैठे हुए देखा. मस्तक को फिर ऊपर किया तो भगवान बाहर रथ पर बैठे दिखे. इस प्रकार बार-बार भगवान को एक साथ दो जगह विद्यमान देख कर उनके मन की शंका दूर हो गई . वह समझ गए क़ि ये दोनों भाई साधारण मानव नहीं हैं, बल्कि मानव रूप में नारायण के अवतार है कंस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. स्नानादि अवश्यक कार्य समाप्त करके गांदिनीनंदन ने पुनः रथ हांक दिया.और दिन ढलते ढलते वे मथुरापुरी जा पहुंचे. इस बीच गोप-गणों के साथ नन्दबाबा भी वहां पहुंच चुके थे. उन्होंने मथुरा नगर के बाहर एक बगीचे में डेरा डाल दिया. भगवान श्रीकृष्ण और बलराम उसी पड़ाव में नंदबाबा के पास रुक गए और अक्रूर को रथ लेकर अपने घर जाने को कह दिया.

श्रीकृष्ण और बलराम ने मथुरा पहुंचकर नगर में कंस द्वारा उनको मारने के लिए तैनात मतवाले हाथी को तथा चाणूर, मुष्टिक,आदि पहलवानों को मार गिराया. फिर पापी कंस और उसके आठ भाइयों का वध किया. तदोपरांत अपने माता-पिता को बंधन से छुड़ा कर उनके चरणों में मस्तक रखकर उनकी वन्दना की. उसके बाद दोनों भाई अपने नाना उग्रसेन के पास गये और उनको कारागार से मुक्त करके यदुवंशियों का राजा बनाया. यज्ञोपवीत हो जाने के बाद उन्होंने गुरु संदीपन के पास जाकर विद्या अध्यन किया और गुरु दक्षिणा स्वरुप उनके मृतक पुत्र को जीवित किया . भगवान श्रीकृष्ण कुछ दिन बाद उद्धवजी और बलरामजी को साथ लेकर, कुछ अपने हितार्थ तथा कुछ अक्रूर जी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उनके घर गए. अक्रूरजी उनको वहां आया देखकर बहुत आनंदित हुए तथा भगवान कृष्ण, बलराम और उद्धवजी का बहुत सत्कार किया. कुशल क्षेम आदि पूछ लेने के बाद श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा -" हस्तिनापुर में महाराज पाण्डु की मृत्यु हो जाने केबाद धृष्टराष्ट्र वहां की गद्दी पर आसीन हुए है . वह बुआ कुंती और उनके पुत्र पांडवों के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे हैं. इसलिए हे चाचा जी! आप पांडवों के हितार्थ, उनका वृतांत जानने के लिए हस्तिनापुर पधारें."
(क्रमशः)
वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां ।
यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।i
यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः।
यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।।
(श्रीमदभागवद्महापुराण)


अर्थ:

यदु वंश परम पवित्र वंश है. यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है. इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है. जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा.